रामनवमी के दिन किया आचार्य भिक्षु ने अभिनिष्क्रमण


- उग्रविहारी तपोमूर्ति मुनिश्री कमलकुमार
आचार्य भिक्षु एक क्रांतिकारी आचार्य थे। वे अहिंसा, संयम, तप के उत्कृष्ट साधक थे। अनुशासन मर्यादा का सदा सम्मान करने वाले थे। दीक्षा के मात्र 8 वर्ष पश्चात आगमों का तलस्पर्शी अध्ययन करने से उन्हें लगा हम आगमों की दुहाई तो देते हैं परन्तु हमारी चर्या उससे भिन्न है। उन्होंने अपनी जिज्ञासाएं अपने दीक्षा गुरू पूज्य रघुनाथ जी के चरणों में निवेदन की उस समय पूज्यप्रवर ने फरमाया। भीखण तेरा कथन अन्यथा नहीं है परंतु यह पांचवां आरा है। इसमें शुद्ध साधुत्व का पालन करना आसान नहीं है, पले जैसा ही पालो। आचार्य भिक्षु ने गहरा चिंतन मंथन किया कि मेरी बात मिथ्या तो नहीं है यह तो स्पष्ट हो ही गया है। अब जब साधना के लिए घर बार छोड़ ही दिया है तो संघ का मोह करने से तो सफलता नहीं मिल सकती उन्होंने तटस्थ आत्मस्थ होकर वि.सं.1817 को चैत्र सुदी नवमी को बगड़ी मारवाड़ से स्थानक वासी सम्प्रदाय से अभिनिष्क्रमण किया।



अभिनिष्क्रमण के साथ ही भिक्षु की मानो कड़ी कसौटी प्रारंभ हो गई। नगर में समाज ने पड़ह फिरवा दिया कि कोई भी भीखण जी को रहने का स्थान देगा उसे समाज से बहिष्कृत कर दिया जाएगा। इधर आंधी का प्रकोप प्रारंभ हो गया अन्यथा विहार कर अगले गांव जाया जा सकता था। उस स्थिति में भी उनका मनोबल सुदृढ़ बना रहा। लोगों ने सोचा स्थानाभाव के कारण इन्हें वापस स्थानक ही जाना पड़ेगा परंतु भीखण जी अपने संकल्प पर अडोल रहे और नगर के बाहर श्मशान घाट में बनी जैत सिंह जी की छतरी पर रात्रि प्रवास किया स्थान इतना छोटा था कि पांच संतों का बैठ पाना भी कठिन था। रात्रि में शयन की स्थिति नहीं थी पूरी रात अपने संतों से धर्म चर्चा करते रहे। अगले दिन प्रातः विहार किया। उनके दिल दिमाग में भगवान महावीर तथा उनके सिद्धांत बसे हुए थे। इसलिए आहार, पानी, स्थान व शयन आदि की प्रतिकूल स्थिति उन्हें विचलित नहीं कर पाई। ज्यों ज्यों समय बीतता गया उनका मनोबल संकल्प बल अग्नि में तप कर सोने की भांति कुन्दन बनकर निखरता गया। कौन जानता था कि यह तेरापंथ जन जन का पंथ बन जाएगा आज पूरे जैन समाज में ही नहीं अपितु पूरे धार्मिक समाज में तेरापंथ का वर्चस्व है।


देश विदेश में आज तेरापंथ की मांग है। तेरापंथ के सिद्धांत अकाट्य हैं क्योंकि यह महावीर की साधना से प्राप्त सिद्धांतों का पोषक है। आचार्य श्री तुलसी और महाप्रज्ञजी ने अपने प्रवचनों और साहित्य के माध्यम से इसे जैन भोग्य ही नहीं जन भोग्य बना दिया। वर्तमान में महातपस्वी महातेजस्वी मृदुभाषी आचार्य श्री महाश्रमण जी ने देश विदेश की पैदल यात्रा कर जो गरिमा महिमा बढ़ाई है उसे जड्लेखनी से लिख पाना हर कोई के लिए संभव नहीं है। अभिनिष्क्रमण दिवस पर इस पावन पथ के प्रणेता तेरापंथ धर्मसंघ के आद्य प्रवर्तक भिक्षु स्वामी को शत.शत नमन अभिनन्दन।
– मुनि कमलकुमार