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चीन पर अगर संदेह है तो क्यों नहीं न्याय की चौखट पर लाया जाए
   राजेन्द्र सिंह जादौन

विश्व अभी संकट के दौर से गुजर रहा है। चारो तरफ हा हा क़ार मचा हुआ है। ऐसा लग रहा है कि प्रलय दरवाजे पर खड़ी है। इसके चलते विश्व चीन की ओर कातर नजरो से देख रहा है। इसका कारण कुछ वास्तविक तथ्य है। इन तथ्यों को पूर्वाग्रह कहकर खारिज नहीं किया जा सकता है। अगर यह मान लिया जाए कि वुहान में कोराना वायरस की उत्पत्ति प्राकृतिक तौर पर ही हुई थी तो इस वायरस की मानव से मानव में संक्रमण की प्रकृति को चीन ने समूचे विश्व से छिपा कर क्यों रखा। डॉक्टरों ओर पत्रकारों को इसका खुलासा करने से रोका गया। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कोराना संक्रमण को महामारी घोषित करने में अनपेक्षित समय लगाया। विश्व स्वास्थ्य मामलों मै इस संस्था को विशेषज्ञ ही मानता है ओर उस पर निर्भर भी करता है।विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा महामारी घोषित करने में की गई देरी के कारण देशों ने अपनी अंतरराष्ट्रीय सीमाएं सील करने जैसे कदम देरी से उठाए। 
     चीन द्वारा अपने हुबेई प्रांत में फैले संक्रमण की प्रकृति को छिपाया गया यही बहुत बड़ा ऐसा तथ्य है जो कि उसे समूची मानवता के प्रति अपराधी ठहराता है। अब सवाल यह भी है कि हुबेई प्रांत में फेला यह संक्रमण चीन के ढाई तीन करोड़ की आबादी वाले शहर बीजिंग ओर शंघाई में मारक क्यों नहीं हुआ। बीजिंग में मात्र आठ ओर शंघाई में मात्र पांच लोगो की मृत्यु कोराना वायरस के संक्रमण से हुई। इसके विपरीत यह अमरीका ओर इटली जैसे देशो के साथ यूरोप में तबाही मचाए हुए है। तो क्या यह अंतर भी प्राकृतिक है।हुबेई प्रांत ओर वुहान में इस वायरस के संक्रमण से मरने वालो को अगर देखा जाए तो इनमे पचास फीसदी लोग वृद्ध बताए जा रहे है। चीन तो पहले ही वृद्ध आबादी को बोझ समझ रहा है तो क्या यह भी प्राकृतिक था कि वायरस ने चीन का बोझ हल्का करने का काम किया।
    एक बड़ा तथ्य यह भी है कि विश्व स्वास्थय संगठन ने भले ही कोराना संक्रमण को महामारी घोषित करने में अनपेक्षित विलम्ब किया लेकिन चीन सरकार ने अपने देश की कम्पनियों को बड़े पैमाने पर मास्क बनाने को जनवरी मह मै ही कह दिया था।अब हाल यह है कि चीन ने हुबेई प्रांत का लॉक डॉउन समाप्त कर अपने सभी कारखानों में उत्पादन शुरू कर दिया है। चीन दुनियाभर मै बढ़ते संक्रमण का व्यापारिक फायदा उठाने के लिए तैयार है। दुनिया में मास्क, सेनेटाइजर,वेंटिलेटर की मांग बढ़ रही है तो चीन अपने उत्पाद बेचने को तैयार है।चीन में कुल 3300लोगो की मौत के बाद जल्दी ही हालत सामान्य होने ओर व्यवसाय की ओर जल्दी कदम उठाने  का संकेत यह तो होता ही है कि संक्रमण की प्रकृति को छिपाकर मोका हासिल किया गया। यह समूची मानवता के प्रति अपराध है।
     अभी चीन के पूर्व सैन्य अफसरों द्वारा नब्बे के दशक में लिखी गई एक पुस्तक की भी चर्चा है। इस पुस्तक मै चीन को विश्व की महाशक्ति के रूप में स्थापित करने के लिए अमरीका को पतन की ओर ले जाने का अभिप्राय जाहिर किया गया है।
    बहरहाल जो तथ्य है वो संकेत देते है कि चीन ने संक्रमण की प्रकृति को छिपा कर मानवता के प्रति जो अपराध किया है उस पर संपूर्ण विश्व को विचार करना चाहिए। इसके लिए अंतरराष्ट्रीय न्यायालय जैसी किसी व्यवस्था में न्याय की गुहार लगाने चाहिए ओर चीन से इस मानवीय संकट का पूरा मुआवजा वसूल किया जाना चाहिए।
  इस संकट ने खुलासा किया है कि  अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं किस तरह कुछ ताकतों का मोहरा बनी हुई है। इन संस्थाओं मै जरूरी सुधार के कदम उठाया जाना चाहिए। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जी 20 की बैठक में विश्व स्वास्थ्य संगठन को स्वायत्त स्थिति में रखने का मुद्दा उठाया भी था। आज विश्व को न्यायिक व्यवस्था की जरूरत है। इसके लिए विश्व को कुछ महाशक्तियों की मुट्ठी में छोड़ देने के बजाय बहूध्रुवीय व्यवस्था में लाना जरूरी हो गया है। इसके जरिए कुछ एकाधिकार पैदा करने वाली शक्तियों को नियंत्रित करने में मदद मिलेगी।